Thursday, August 29, 2013
Wednesday, August 28, 2013
Saturday, March 1, 2008
सब्जी वाले
तीज पर त्यौहारों पर ,
इतवार गुरुवार शनिवार की हाट बाजारों पर ,
इन्हे मशरूफ देखा ,
इन सब्जी वालों को आधी रात को घर लौटते देखा ,
देखा है इनकी बीबी को ,
उनीदी आखों से घर के दरवाजे खोलते देखा ,
देखा रात तक जागते हुए खाना खाकर ,
देर सुबह उठते देखा ,
अगली हाट की तैय्यारी करते देखा ,
सब्जी पर पानी डालते देखा,
टमाटरों को साफ कपड़े से चमकाते देखा ,
कभी कभी चुटकियाँ ,झिड़की , मस्ती करते देखा ,
कभी कभी पुलिस से पिटते देखा ,
कभी कभी आपस में लड़ते देखा ,
धंधा जो हुआ , बन्दा जो खुश हुआ ,
रास्ते पर गाना गुनगुनाता हुआ देखा ,
इन सब्जी बेचनेवालों को अपने दस साल के बच्चे ,
को हाथ ठेले पर बैठाकर आधी रात को ,
सड़क पर घर लौटते देखा ।
तीज पर त्योंहारो पर ,
इतवार गुरुवार शनिवार की हाट बाजारों पर ,
इन्हे मशरूफ देखा ।
सोचो
कभी सोचा मंजिल बनाकर,
ये गरीब मजदूर किधर जायेंगे,
इनके बच्चे वर्षों बाद,
इस शहर में कोई सड़क बनाएगे,
लाचार इनकी बेटी को,
रईस घर के बच्चे कामवाली बाई कहेंगे,
शाम तलक तंग बस्ती में,
इनके बच्चे इंतजार करेंगे ,
रात शहर की गोद में थके मांदे सोयेंगे ,
दूसरे दिन की सुबह और खिलती धूप में ,
ये मजदूर मजदूरी के ठियों पर दिखेंगे ,
कभी सोचा मंजिल बनाकर ,
ये गरीब किधर जायेंगे ।
इच्छा
आओ आंसुओं को पढ़ लें,
आओ काँटों को गले लगा लें ,
आओ तन्हा को महफ़िल दिखा दें ,
आओ टूटों से टूटकर मौहब्बत कर लें,
देने को सारी कायनात दें दें,
ये मौहब्बत का शगुन है,
आओ,
दिल किसी को तोहफे में दे दें
प्रेम
तकदीर का खेल था,
न तस्वीर में साथ थे ,
न सफर में साथ थे ,
मगर एक दूजे के दिलों में रहते हैं ,
यही सुकून,
हम-तुम जुदा ,
मगर इस जहाँ में रहते हैं
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