Tuesday, February 26, 2008

अमीर और गरीब

मेरे गरीब पिता मरने के बाद ,
अपने पीछे सच्चाई और संस्कार छोड़ गए ,
भाई बहिन रिश्ते नातेदार,
प्रेम व्यवहार आशीर्बाद छोड़ गए ,
और कुछ अपने अधूरे ख्वाब छोड़ गए ,
और अमीर दोस्त के पिता मरने के बाद,
रिश्तों मे तकरार ,
मुक़दमे की बहस छोड़ गए ,
मकान - दुकान मोटर- कार ,
नौकर चाकर और ढेर सारा रोजगार छोड़ गए ,
और सबसे ख़राब चीज
घर गृहस्थी धंधे का अधूरा हिसाब छोड़ गए ।

Monday, February 25, 2008

दहेज़ एवं चरित्रहीन पति

स्वप्न एक लड़की के ,
सिसकियों में बदल गए ,
"वर" जब नीचता के शिखर हुए,
रूप यौवन घर-आगन बिखर गए,
वो आह से ना बच पायेगा ,
वह शाप से ना बच पायेगा ,
वरदान पाये भष्मासुर वक्त के हाथों मिट गए ,
जब राम के वेष में,
लालची ब्याह रचाते गए ,
स्वप्न एक लड़की के ,
सिसकियों में बदल गए.

मिट्टी

मिट्टी हो गया मैं, घर की आरजू लिए,
और लोग मिट्टी ले गए मेरी कब्र की ,
घर बनाने के लिए ।

Sunday, February 24, 2008

बेईमान



लोगों ने ज़मीने खरीदी,
लोगों ने महलनुमा बंगले बनवाये,
लोगों ने चार -चार शादियाँ रचाई,
लोगों ने ताउम्र एशों आराम में गुजारी,
ये वे लोग थे जिन्होंने आदर्श की किताब पढी थी ,
मगर ईमानदारी इंसानियत
की अच्छी कीमत मिलने पर उसे बेच दिया.


इन्साफ

ये भी अजब इन्साफ है हमारा ,
जिन्दगी भर घर की दीवारों पर,
बैठे मच्छरों को मारते रहे ,
और घर के बाहर घूमनेवाले
मुजरिमों के सामने मुस्कराकर बगल से गुजरते रहे ,
"कितने दिलेर है हम"
ये भी अजब इन्साफ है हमारा।

जन्मदिन

गैरों की महफ़िल में रतजगे करते हैं ,
बॉस का बर्थडे सेलिब्रेट करते हैं ,
अरे ये क्या मिसाल दी मैंने ,
जिनसे रोशन है दुनिया अपनी ,
वो "दिए" तो अपने घर पर इन्तजार करते हैं .

Saturday, February 23, 2008

सच


सच सपने बेचकर
मच्छरों के साथ झुग्गी में सो रहा है,
झूठ मोबाइल लिए
मक्कारी और बदमाशी के साथ चौराहे पर घूम रहा है,
नेता ले रहे गुंडों की क्लास
और नेता आदर्शों की किताब रद्दीवाले को बेच रहा है ,
प्रेम हो गया पैसा,
पैसा हो गया प्यार, स्नेह की गंगोत्री है पैसा ,
पैसे से शुरू हुआ जीवन का व्यापार ,
इंसा हो गया बैचैन और लाचार ,
सब्जी रोटी खाता नहीं ढंग से ,
आदमी है कि बड़ा बनने की ललक में,
आदमी - आदमी को खा रहा है ।



मह्गाई



उम्र
से भी तेज,
मह्गाई बढ़ रही है ,
अब सपनों के फोटो एलबम में लगाएं जायेंगे ,
शिक्षा की ऊंची ऊंची दुकानों पर ,
कर्ज लेकर छात्र पढ़ रहे हैं ,
इनके बाप भी कर्ज में पैदा हुए,
और आज भी कर्ज ढो रहे हैं ,
मुस्कराहट भी अपनी नहीं ,
गिरवी हैं बैंक के पास,
मुस्कराना अब मजबूरी हुआ करेगी ,
उम्र से भी तेज मह्गाई बढ़ रही है ,
अब सपनों के फोटो एलबम में लगाए जायेंगे .


पत्थर का निवेदन

मत तराशो मुझे तराशकर ना मूरत बनाना ,
मूरत बनाकर ना मन्दिर में बिठाना,
क्योंकि मन्दिर में बिठाकर लोग पाप की माफ़ी,
या फिर मन्नत मागेंगे ,
या फ़िर तुम मुझे ताले में कैद कर दोगे,
तो में अकेला ही रहूँगा ,
या फिर मन्दिर का दरवाजा खुला छोड़ दोगे ,
तो इन आवारा कुत्तों का क्या है,
कुछ भी कर जायेंगे ।

दर्द


बिछ्ड़कर तुमसे क्या कर रहा हूँ ,
सिर्फ़ दर्द और बेबसी लिख रहा हूँ ।
जिन्दगी पड़ी असमंजस में,
है दिल नादाँ इसे समझा रहा हूँ ,
करूँगा और क्या ?
बिछड़ने के बाद यादों को दोहरा रहा हूँ ,
हूँ इतना उदास और बेचैन,
तेरे पैरों के निशाँ रेत में बना रहा हूँ ,
हैं मेरे यार, जो जानते हैं, ये प्यार का रिश्ता,
अक्सर यही पूछते,
दर्द से तुम्हारा क्यों हो गया वास्ता ,
बताता नहीं सिर्फ़ बहला रहा हूँ
हैं हैरान हम क्यों गम से हो गई
पता नहीं आंसू और आंसू ढलका रहा हूँ ,
बिछ्ड़कर तुमसे क्या कर रहा हूँ,
सिर्फ़ दर्द और बेबसी लिख रहा हूँ ।

प्रीत का अतीत



फूल सा चेहरा था, ऋतू सावन थी ,
उस दीवाने के दीवानेपन से,
वह चांदनी सी शर्माती थी ,
इस गर्दिशी दौर में , आए अनेक मोड़ हैं ,
हालत अच्छी नहीं थी दीवाने की,
चंद सिक्के कर गए विदाई चांदनी की ,
अक्सर बड़े शहरों में यही होता है ,
कलाकार मन्दिर से जुदा होता है,
ना गाओ गीत ना गाओ गजल ,
इसी इश्क से निगाहें किसी की नम हैं ,
सिलसिले शुरु हुए थे,
बालू के घरौंदों से , तय किया उसने आज तक,
सपनो का सफर, हुआ वक्त का कत्ल एक सदी के बाद,
वह चाँदनी किसी की रागनी है ,
दीवाना लिए खोटे सिक्के सड़क पर है ,
बेअसर ना होगी प्रीत उसकी ,
बेवफा रोएगी कब्र पर उसकी ,
क्या देखे वह बुझे चेहरे, वफ़ा की किताब को ,
अतीत का धुंधला उसका दर्पण है .

सलाम

जब होंठ चुप रहते हैं, निगाहें बोलती हैं,
तो समझो मौहब्बत का सलाम होता है,
नजरों में ख्वाबो के लश्कर रहतें हैं ,
जब धड़कन तेज धड़कती है ,
तो समझो मौहब्बत का सलाम होता है ,
कमसिन चेहरा आईने में देखे,
लड़की गुलाब किताबों में छुपाती है ,
तो समझो मौहब्बत का सलाम होता है ,
जब झील में कमल खिलता है ,
सुबह सूरज की किरण बिखरती है ,
ठंडी ठंडी पवन तुमसे टकराती है ,
रह रहकर यादों में मुस्काराओ,
तो समझो मौहब्बत का सलाम होता है ,
जब शमा-परवाने को आगोश में लेती है ,
जब फूल पर भवरें मड राते हैं ,
जब सहेली की बात पर लड़की शर्माती है ,
तो समझो मौहब्बत का सलाम है ,
जब झरना कल कल शोर मचाता है,
जब कोयल मीठा राग सुनाती है ,
जब दूल्हा घोड़ी चढ़ता है ,
दुल्हन सोलह श्रृंगार करती है ,
तो समझो मौहब्बत का सलाम होता है ।

पवित्र प्यार

मैं तुम्हारे खवाब में आकर
एक फासला रखकर मिलता हूँ ,
कि मेरी मौहब्बत पर कोई इल्जाम ना आए,
मैं इस बात से डरता हूँ ,
तेरा जिक्र मेरी जिन्दगी, तेरी फिक्र मेरी बन्दगी,
मौहब्बत इबादत मेरी,
मैं सदियों से करता हूँ,
मैं कहीं भी रहूँ, इससे क्या फर्क पड़ता है,
तुम हो राजी-खुशी से,
मैं इस बात की ख़बर रखता हूँ .

मेहबूब का चेहरा



दिन भर कि थकान, पैसों की तंगी,
जमाने भर की बेकार बातें,
मुश्किल हालात् जिन्दगी के,
एक तेरे मुस्कराते चेहरे के सामने,
सब झूठ से लगते हैं .


Friday, February 22, 2008

तन्हा

मैं ख्वाबों के लश्कर मे रहता था,
मुझे रिश्तों ने तन्हा कर दिया,
मुझे महफिलों मे ना ढूढों,
मैं समुन्दर के साहिल पर मिलता हूँ.

ईश्वर आज अवकाश पर है


ईश्वर आज अवकाश पर है ना मन्दिर की घंटी बजाइये,
जो बैठा है बूढा अकेला पार्क में , उसके साथ समय बिताइये ,
ईश्वर है पीड़ित परिवार के साथ, जो अस्पताल में परेशान है,
उस पीड़ित परिवार की मदद कर आइये ,
जो मर गया हो किसी के परिवार में कोई ,
उस परिवार को सांत्वना दे आइये ,
एक चौराहे पर खड़ा युवक काम की तलाश में ,
उसे रोजगार के अवसर दिलाइये ,
ईश्वर आज अवकाश पर है ना मन्दिर की घंटी बजाइये ,
ईश्वर है चाय कि दुकान पर उस अनाथ बच्चे के साथ ,
जो कप प्लेट धो रहा है , पाल सकते हैं, पढ़ा सकते हैं ,तो पढाइये,
एक बूढी ओरत है जो दर - दर भटक रही है,
एक अच्छा सा लिबास दिलाइये ,
हो सके तो नारी आश्रम छोड़ आईये ,
ईश्वर आज अवकाश पर है ,
ना मन्दिर की घंटी बजाइये .

जिन्दगी की महाभारत



कब तक लोग मेरी जिन्दगी ,
युधिष्ठर की तरह दाव पर लगाते रहेंगे ,
और कब तक ध्र्स्तराज की तरह ,
मै कष्ट महसूस करता रहूंगा,
और कब तक लोग एकलव्य की तरह,
मेरा अगुन्ठा काटते रहेंगे ,
और कब तक द्रोपदी की तरह ,
मेरी इज्जत उछालते रहेंगे,
और कब तक मैं भीष्म तरह ,
कांटो की सेज पर लेटा रहूंगा ,
अब मुझे द्रोणाचार्य से मिलाओ ,
मुझे अर्जुन बनना है ,
अब मुझे कृष्ण से मिलाओ ,
मुझे जिन्दगी की महाभारत जीतनी है ।

मेहबूब


मुखड़ा मेरे मेहबूब का सुंदर है,
वैसा गीत नहीं लिख पाता हूँ ,
वो जलवे, वो आखों के निमंत्रण पढ़ पाता हूँ ।
उसके दिल कि धड़कन, व्याकुल मन समझता हूँ ।
वैसा गीत नहीं लिख पाता हूँ ।
उसके होंठों के कम्पन, जुल्फों की आंधी से बचता हूँ ,
वैसा गीत नहीं लिख पाता हूँ ।
उसके श्रन्गारों का मतलब,उसके व्रत रखने का मकसद मालूम मुझे,
वैसा गीत नहीं लिख पाता हूँ
साथ पड़े थे, साथ खेले थे, साथ लड़े थे,
परिणय बन्धन समझता हूँ ।
उसके घर की कल्पना, सागर सा सपना ,
उसके प्रश्न समझता हूँ ,
वैसा गीत नहीं लिख पाता हूँ ।
उसका असमय मिलना - विदा होना ,
यादों में प्यार करना समझता हूँ ,
वैसा गीत नहीं लिख पाता हूँ ।
मन्दिर की आरती , मस्जिद की अजाने ,
उसके दिल से निकली दुआएँ पड़ हूँ पाता हूँ ।
उसके निर्मल ह्रदय, तन की खुशबू ,
उसके घर की तरफ़ से आती हवाओं का पैगाम समझता हूँ .
उसके पायल की झनक , कंगन की खनक ,
उसके चुप रहने से मुस्कराने तक का सफर मालूम मुझे ,
वैसा गीत नहीं लिख पाता हूँ ।

एक सच एक झूठ



एक शादी की बारात् ने सौ जाम का मजा दे दिया,
एक मैयत देखी तो होश उड़ गए

साथी


सागर में चलती नाव पर , बैठे मांझी सा प्यासा हूँ ,
तेरे शहर में जो पढ़ा ना गया ,
बंद लिफाफे में पड़ा वो कागज़ का टुकडा हूँ ,
चेहरे देखते थे मुझमे रोज तुम,टूटकर गिरा हूँ,
गिरे हुए को उठाकर,
खिड़की से फैंका गया वो मैं आईने का टुकडा हूँ ,
चुना तुमने मुझे, सजाया जुल्फों में,
महक जाने पर, मुरझाने पर, सूख जाने पर ,
शामिल कर दिया गया कूड़े के ढेर में ,मैं वो गुलाब हूँ,बात करते थे,
पढ़ते थे साथ कदम दो पीछे चलते थे तुम,
नोट्स पढ़कर पास हुए मेरे ,इस्तेमाल किया गया वो लड़का हूँ ,
कभी पहनकर इतराते थे तुम,बंद अलमारी में पढ़ा हुआ ,
मैं तेरा मनपसंद वो लिबास हूँ ,
होंठों तक ले गए, मुझे चूमा,
छोड़ दिया बची चाय की शक्ल में,
वो अहसास हूँ ,
रहा हूँ साथ तुम्हारे, पर ना देखा गया,
तुम्हारी खुली आंखों का में वो खवाब हूँ ,
तुम्हारे भेजे गए पत्रों का, चाहतों का,
सवालों का जो ना लौटकर आया कभी वो जबाव हूँ ,
ना बनाया कभी, ना तोडा कभी,
इन्तजार करती हो नए रिश्तों का ,
घर की चोखट पर खड़ी हो, मैं वो दरवाजा हूँ ,
जो दिल के करीब हूँ .

मोहलत जिन्दगी कि

कुछ साल बाद, हम भी ओरों की तरह ,
यादों में-किस्सों में, कहानिओ में मिलेंगे,
आज महक रहा है, प्यार का चमन,
फूलों की खुशबू साँसों में ढल रही है,
हो सकता है कल हम मजबूर हो ,
तुम गुजरो बैगानों से , बाजार में,
हम इत्र की तरह बंद शीशिओं में कैद नजर आयें,
आज हिना की पत्तियों सा हरा प्यार हमारा,
साथ रहकर निखर जाएं ,
ना जाने कौन सा पतझड़ सुखा दे हमें ,
ना जाने कौन सी दुल्हन की हथेलियों पर नजर आयें ,
ये ओढ़नी जो तोहफा है मौहब्बत का,
पहनकर शर्माने का मौसम है,
ऋतू जाने के बाद,
चुनरी जख्मों पर,पट्टियों की तरह नजर आयें,

Monday, February 18, 2008

अदा

कभी दूर थी, कभी पास थी ,
जुगनू थी, साकार थी,
मैंने तुम्हें सपना कहा ,
मौहब्बत ने मौहब्बत का नाम रखा
सोना थी, चांदी थी,
शोहरत थी , चाबी थी, खजाने की,
मैंने तुम्हे जिन्दगी की अमानत कहा ।
मौहब्बत ने मौहब्बत का नाम रखा ।
दिल है , दिवाली है ,
अदा है, अदावत है ,
जिस घर मैं तुम रहते हो,
मैंने उसे जन्नत कहा।
मौहब्बत ने मौहब्बत का नाम रखा।
सुबह-दोपहर -शाम है,
अमावास्या-पूनम की रात है ,
मगर तेरी जुल्फौं को मैंने काली घटा कहा।
मौहब्बत ने मौहब्बत का नाम रखा
शराब हैं, पैमाने है, महफिलें हैं मयखाने हैं ,
मैंने तेरी नजरों को जाम कहा ,
धरती अम्बर सितारों के रहते ,
मैंने तुम्हें चन्द्रमा कहा,
पोधे पत्तियों के रहते मैंने तुम्हें फूल कहा ,
मौहब्बत ने मौहब्बत का नाम रखा .



राजा और भगवान्

राजमहल की सूनी दीवारें आज,
यही दास्ताँ कहती हैं, कि हुकुम चलानेवालों के जमाने नहीं रहते,
जो सुनता है, सबकी सदायें, जो न्याय करते हैं ,
हम उन्हें भगवान् कहतें हैं .

असीम

प्यार कि हद के पार भी , प्यार करना चाहता हूँ ,
तुम मंजिल ना सही, मील के पत्थर ही नजर आओ ,
मैं जिन्दगी को कभी ख़त्म ना होनेवाले सफर पर चलाना चाहता हूँ .

श्रधांजलि पिता के प्रति

एक मेरा बाप है, जो बच्चौं कि खातिर, जीने के सामान जुटाता हुआ ,
भरी दुनिया में गुमनाम सा रहा , और इसी दुनिया में,
एक नंगा-शातिर-अदना सा आदमी,
बिखरे परिवार का सदस्य,
पैसे की दम पर अखवार की सुर्खी बन गया

चन्द बातें

एक मुलाक़ात चाहता हूँ ,
और उसकी याद में वर्षो गुजारना चाहता हूँ
@ @ @
बदनाम हम हुए तो, मशहूर तुम भी ना होंगे,
ये मेरी मौहब्बत ठुकरानेवाले ज़माना तुझको भी भुला देगा ।
$$$
मैं मन्दिर नही जाता, मस्जिद नही जाता,
तुमसे मिलकर बताना है कि तुम मेरी जिन्दगी में क्या हो ।
***

ईश्वर आज अवकाश पर है

ईश्वर आज अवकाश पर है ना मन्दिर की घंटी बजाइये,
जो बैठा है बूढा अकेला पार्क में , उसके साथ समय बिताइये ,
ईश्वर है पीड़ित परिवार के साथ, जो अस्पताल में परेशान है,
उस पीड़ित परिवार की मदद कर आइये ,
जो मर गया हो किसी के परिवार में कोई ,
उस परिवार को सांत्वना दे आइये ,
एक चौराहे पर खड़ा युवक काम की तलाश में ,
उसे रोजगार के अवसर दिलाइये ,
ईश्वर आज अवकाश पर है ना मन्दिर की घंटी बजाइये ,
ईश्वर है चाय कि दुकान पर उस अनाथ बच्चे के साथ ,
जो कप प्लेट धो रहा है , पाल सकते हैं, पढ़ा सकते हैं ,तो पढाइये,
एक बूढी ओरत है जो दर - दर भटक रही है,
एक अच्छा सा लिबास दिलाइये ,
हो सके तो नारी आश्रम छोड़ आईये ,
ईश्वर आज अवकाश पर है ,
ना मन्दिर की घंटी बजाइये .

Sunday, February 17, 2008

रुपया

कुछ साल और ठहर जाओ,
लोग रूपये को भगवान् कहेंगे ,
और धनी भी देवता समान होंगे ,
मौहब्बत की देवियाँ राजविलास में मुजरा करेंगी ,
गरीबी सिसकियाँ भरेंगी ,
और लोग एक दूसरे को मरने की दुआएं देंगे

बेईमान जिन्दगी

कैसे नाजों से पली किन ख्वाबो से सजी,
हर वक्त मोहताज किया इसने, मुझे तो अरमानों की अर्थी लगती है जिन्दगी ,
सितारे ना हुए बुलंद अपने ,
दागदार हो गया अफसाना मेरा ,
उसकी मौहब्बत मेरा बहम था,वो आज है किसी कि नूर-ए- नज़र,
मेरी तो अँधेरी हो गई है जिन्दगी ,

मांझी

मांझी हूँ, साहिल तक, पहुँच जाऊंगा ,
डूब जायेंगे मेरी कश्ती डुबोनेवाले

तलाश

ये जो मछलियाँ हैं,एक्वेरियम में ,
ये भी समुन्दर को तलाश करती हैं ,
समुन्दर मैं गई तो बड़ी मछलियों का निवाला बनेंगी ,
या एक्वेरियम के ठहरे हुए पानी में कभी ना कभी मरेंगी,
ये जो मछलियाँ हैं , एक्वेरियम में ,
ये भी समुन्दर को तलाश करती हैं ,

दास्ताँ

क्या जानोगे मेरी दास्ताँ और राज,
कि मेरे रेशमी कफन पर लगे पैबंद कह देंगे कि
हम जिए कैसे और मरे कैसे ।

आदमी

यहाँ तितलियाँ भी हैं, भवरे भी हैं ,
यहाँ शेर भी हैं , बिल्ली भी है, लोमड़ी है, साँप है, नेवले भी हैं ,
मेढक है, शार्क है ,छोटी छोटी मछलियाँ हैं,
है जंगली व्यवस्था, इसे हम शहर कहते हैं ,
पत्थर की इमारतों में, यहाँ आदम और हब्बा मिलेंगे ,
हैं तरह तरह के जानवर यहाँ ,
दूडो बहुत मगर इंसान ना मिलेंगे .

दीवानगी

तुम मेरे लिए ऐसे ही ख्वाब बने रहो,
मैं यू ही हर दिन, नए गीत लिखता रहूँ ,
मैं तुम्हे ऐसे ही चाहूँ,
तुमसे किसने कहा कि, तुम मुझसे मौहब्बत करो .

Saturday, February 16, 2008

सादगी

तुम मेरे इतने करीब आए कि,
लोग जलते हैं , मगर तुम दुनिया बता दो ,
कि हम तुम नदी के दो किनारों से मिलते हैं .

अहसास

तुमने करीब आकर माहौल को महका दिया,
तुम्हारे जाने के बाद, आज रात मीठे ख्वाब आयेंगे.

बेबसी

मैं जा रहा हूँ यहाँ से,
ये एक इत्तेफाक है,
ऐसी बेबसी कहीं और देखो तो बताना कि,
मुझे चाहनेवाला तो, इस शहर में मौजूद है .

दिल की दुनिया

अमीरों से कह दो कि मौहब्बत न करें,
कम से कम ये जागीर तो गरीबों कि रहने दो,
अमीरों को दौलत शोहरत मुबारक हो,
दिल कि तंग गलियों मे ,
हम गरीबों को रहने दो .

फूल

मेरे सामने तुम्हारे दौलत और गुरूर की कीमत कुछ भी नहीं ,
मैंने अपना मेहबूब एक फूल देकर पाया है

नसीब

पैसे की दम पर अपना मुकद्दर लिखा,
जिन्दगी में मुझे सुविधा- बेकरारी- व्यस्तता मिली,
मगर भगवान का लिखा मुकद्दर मिट गया,
भगवान् ने मेरे नसीब में,
थोड़ा दुःख- थोड़ा सुख और संतोष लिखा था।

पिता का सपना

एक पिता ने ख्वाब देखा था,
कि उसका बेटा चन्दा जैसा चमके सितारों में,
पुत्र कि विफलता पर प्रश्न उभरे हैं, पिता की आखों में,
कि कैसे चलते हैं खोटे सिक्के बाजारों में !
ये खोटा सिक्का नही, जिगर का टुकडा है,
कैसे जियेगा हजारों में .

हिन्दुस्तान

लुटता रहा हिंदुस्तान सिकंदर के जमाने से,
आती रही आवाज घुन्गरुओ की की महल के द्वारों से,
हरदम पसीना गिरा है बेबसी का, ये आलीशान मन्दिर हवेली बनाने से,
शान्ति मे अशांति कराते रहे नमक हराम,
खाते रहे निवाले, पीते रहे शराब दुश्मन के प्यालों से ,
यहाँ जंगल राज चलता है, बड़ा छोटे को नचाता है ,ऊँगली के इशारों से ,
आई थी आशा की ज्योति, गाँधी के आन्दोलन चलाने से ,
आजादी की रौशनी आई नेहरू के सत्ता चलाने से ,
नेहरू गए विकास कम हुआ देश का ,
घर भरे नेताओं के सत्ता चलाने से,
मिलती कुर्सी पीते शराब, आता शबाब गरीब घराने से,
हिंदुस्तान लुटता रहा सिकंदर के जमाने से.

नेता

सुधरते हो तो सुधर जाओ वरना तख्तिया बदल जाएँगी ,
ताज बदल जायेंगे ,
ना जाने कितने मुकद्दर लिखने वाले सिकंदर बदल जायेंगे ,
ये जनता की अदालत है यहाँ पेशियाँ नही होती,
एक ही तारीख(मतदान) में हजारों फैंसले लिखे जायेंगे.

मजदूर और पूंजीपति

हम गरीब तो हमारा नाम राजू,
तुम अमीर तो तुम्हारा नाम राज ,
हम सिर्फ़ नाम के राजू , तुम्हे सत्ता के सुख और ताज,
हमे दाल-रोटी नमक-प्याज नही नसीब,
तुम्हें मर्सिडीज, राजभवन मुबारक, तुम्हारे दौलत करीब,
हम्हें महगाई की मार,
दुःख तकलीफ और हरदम विपत्ति ,
तुम गेरों के राज्य मैं राज्य अतिथि,
हमने बनाईं सड़के-भवन-पटरी और पुल ,
तुमने बनाया अपना कार्पोरेट और घराना,
हमे दे दिया रियायत का राशन कार्ड ,
तुम्हें दे दिए गए धंधे के लायसेंस और ग्रीन कार्ड ,
हम गरीब तो हमारा नाम राजू ,
तुम अमीर तो तुम्हारा नाम राज।

शादी

मुल्क -मौहब्बत -मौसम,
सब कुछ बदल सा गया,
साल दर साल मजबूरी में मुस्कराने का दस्तूर सा रहा ,
ना वो कारवा, ना फिर वैसी महफ़िल जमी,
शादी ही मेरी जिंदगी का आखरी जशन रहा

सदाबहार गरीबी

झील के किनारे रईसों के बंगलो पर,
दीप जले- फटाके फूटे और रौशनी हुई ,
आज फिर किसी गरीब के बच्चे ने,
अपनी बस्ती से अमीरों की आतिशबाजी का मजा लूटा .

महिला

एक द्रोपदी ने महाभारत करवा दिया,
एक सीता ने सोने की लंका जलवा दी,
क्या मैं एक मेनका के लिए,
अपने स्वर्ग में आग लगा दू .

दोस्ती

बुलंदीओ पर पहुच जाओ ,
तो इस बात का ख्याल रखना,
कि तुम्हारी बिरादरी के लोग फुरसत मे ना मिलेंगे ,
तुम्हें उदास ना होना पड़े इस लिहाज से,
गरीब दोस्तों के पते याद रखना.

तोहफा

मेरा ये जीवन सुख दुःख की पहेली ही सही,
मैं जिन्दगी के ज्योतिष को जानना चाहता हूँ ,
वो हर एक खवाब जो मेरा मेहबूब देखे ,
मैं उसे तोहफे में देना चाहता हूँ .

माली

उस माली की बददुआये कबूल मुझे ,
मैंने रूठे मेहबूब को मनाने ,
उसके चमन से एक फूल तोडा है.

जिन्दगी की महाभारत

कब तक लोग मेरी जिन्दगी ,
युधिष्ठर की तरह दाव पर लगाते रहेंगे ,
और कब तक ध्र्स्तराज की तरह ,
मै कष्ट महसूस करता रहूंगा,
और कब तक लोग एकलव्य की तरह,
मेरा अगुन्ठा काटते रहेंगे ,
और कब तक द्रोपदी की तरह ,
मेरी इज्जत उछालते रहेंगे,
और कब तक मैं भीष्म तरह ,
कांटो की सेज पर लेटा रहूंगा ,
अब मुझे द्रोणाचार्य से मिलाओ ,
मुझे अर्जुन बनना है ,
अब मुझे कृष्ण से मिलाओ ,
मुझे जिन्दगी की महाभारत जीतनी है .

स्नेह

दौलत ने बहुत साथ दिया जब तक जिंदा रहे,
मेरे मरने के बाद मेरे अजीजो के लिए,
मेरी बांटी हुई मौहब्बत काम आएगी..